आईएनएस करंज

भारत की स्कॉर्पीन श्रेणी की तीसरी पनडुब्बी आईएनएस करंज लॉन्‍च हो गई यानि इसे पानी में उतारा गया मुंबई के मझगांव डॉक पर आईएनएस करंज को लॉन्‍च किया गया और इस दौरान नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा भी मौजूद थे|

मुख्य तथ्य

1.नई पनडुब्बी का नाम 2003 में सेवा मुक्त किये गए कलवरी क्लास के ‘आईएनएस करंज’ के नाम पर रखा गया है

2.करंज मेक इन इंडिया के तहत बनाई गई स्वदेशी पनडुब्बी है |अत्याधुनिक तकनीक और सटीक निशाने के दम पर समंदर में करंज चीन और पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ा सकता है|

3.इसका निर्माण मझगांव डॉकयार्ड ने फ्रांस के सहयोग से किया हैं. आधुनिक तकनीक से बनी यह पनडुब्बी कम आवाज से दुश्मन के जहाज को चकमा देने में माहिर है|

4.इस स्वदेशी पनडुब्बी में तारपीडो जैसे हथियार भी लगे है जो दुश्मन के जहाज या पनडुब्बी को मार गिराने में सक्षम हैं. साथ ही इसमे दुश्मन के इलाके की निगरानी करने के लिए यंत्र लगे हुए हैं. यह पनडुब्‍बी अभी लॉन्‍च हुई है और उम्मीद है इसे अगले साल तक नौसेना में शामिल कर लिया जाएगा|

5.इस क्लास की पहली पनडुब्बी कलवरी को पिछले महीने ही नौसेना में शामिल किया गया था. दूसरी पनडुब्बी खंदेरी का अभी ट्रायल चल रहा हैं. ऐसी 6 पनडुब्बी मझगांव डॉकयार्ड में बनेगी जो 2020 तक नौसेना में शामिल हो जाएगी|

6.हिन्द महासागर में बढ़ती चुनातियों को देखते हुए नौसेना के पास दर्जन भर ही पनडुब्बी हैं इनमें से आधे से अधिक अपनी ज़िंदगी पुरी कर चुके है, लेकिन किसी तरह उनको अपग्रेड कर काम चलाया जा रहा हैं| ऐसे में जितना जल्द ये पनडुब्बी का लॉन्‍च होना नौसेना के लिए बहुत मायने रखता हैं. इन सबके के बूते ही भारत हिंद महासागर मे चीन को जवाब दे पाएगा|

7.करंज टारपीडो और एंटी शिप मिसाइल से हमला करती है. रडार की पकड़ में नहीं आती, समंदर से जमीन पर और पानी के अंदर से सतह पर हमला करने में सक्षम है|

8.67.5 मीटर लंबी, 12.3 मीटर ऊंची और 1565 टन वजन वाली इस पनडुब्बी में ऑक्सीजन भी बनाया जा सकता है ,युद्ध की स्थिति में यह दुश्मन के क्षेत्र से चकमा देकर निकलने में सक्षम है|

9.इससे पहले पहली स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बी आईएनएस कलवरी को 14 दिसंबर, 2017 को और दूसरी पनडुब्बी खांदेरी को 12 जनवरी 2017 को लॉन्‍च किया गया था|

10.शेष तीन पनडुब्बियाँ वेला (Vela), वागीर (Vagir) और वाग्शीर (Vagsheer) अभी निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं, जिन्हें 2020 तक पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है।

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