किंगफिशर: ऋण क्षमता पर सवाल

किंगफिशर एयरलाइंस के डूबते कर्ज की जिम्मेदारी बैंकर बच नहीं सकते। विजय माल्या की इस विमानन कंपनी की वित्तीय स्थिति कभी मजबूत न होने के बावजूद बैंकरों ने क्यों कर्ज उपलब्ध कराया? किंगफिशर एयरलाइंस का अचल संपत्तियों में निवेश उसके कुल ऋण के मुकाबले हमेशा से काफी कम रहा और हर साल वह अंतर बढ़ता गया। ऐसे में बैंकरों के पास उसकी परिसंपत्तियों को बेचकर ऋण वसूलने का विकल्प कभी नहीं रहा। इसके लिए बैंकरों द्वारा किसी व्यक्तिगत उधारकर्ताओं से पूछे जाने वाले सवालों के अलावा दस्तावेजों और जमानत पर गौर किया जा सकता है।

विमानन कंपनी ने 2005 में अपना परिचालन शुरू करने के बाद केवल एक बार (वित्त वर्ष 2011 में महज 33 करोड़ रुपये) परिचालन मुनाफा दर्ज किया। ऐसे में ब्याज भुगतान सहित पुराने ऋण को अदा करने के लिए किंगफिशर नए कर्ज पर निर्भर हो गई। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सब कुछ जानते हुए बैंकरों ने अपनी रकम को डूबते कर्ज के लिए किंगफिशर एयरलाइंस में झोंक दिया। जबकि प्रतिस्पर्धी विमानन कंपनियों ने अलग रणनीति अपनाई। अचल संपत्तियों में जेट एयरवेज का निवेश उसके ऋण दायित्वों से अधिक था और इसलिए बैंक ऋण को उससे पूरी सुरक्षा मिल रही थी। जेट एयरवेज ने पिछले 15 वर्षों में केवल दो बार परिचालन घाटा दर्ज किया और उसने नए ऋण के जरिये कभी भी पुराने कर्ज की अदायगी नहीं की।

किंगफिशर को अच्दी सेहत में रखने के लिए कर्जदाताओं ने 2010 में 2,000 करोड़ रुपये के ऋण पुनर्गठन के लिए आरबीआई से अनुमति मांगी थी। लेकिन आरबीआई ने इसकी अनुमति नहीं दी थी क्योंकि किसी एक विमानन कंपनी को विशेष दर्जा नहीं दिया जा सकता। इस पर बैंक ने पूरे विमानन क्षेत्र के लिए विशेष छूट की मांग की थी। कुल मिलाकर बैंक से कर्ज हासिल करने के लिए किंगफिशर एयरलाइंस वित्तीय रूप से योग्य नहीं थी। इसके बावजूद बैंकों ने करीब एक दशक तक उसे कर्ज उपलब्ध कराया। लेकिन तेल कीमतों में तेजी और आर्थिक मंदी के कारण स्थिति और बिगड़ गई।

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