खेल(तीरंदाजी)

किसी निश्चित लक्ष्य पर धनुष की सहायता से बाण चलाने की कला को धनुर्विद्या (Archery) कहते हैं।प्राचीन काल से ये युद्ध विद्या का एक हिस्सा था जबकि वर्तमान में ये एक खेल है जो सभी खेल प्रतियोगिताओं में शामिल है|

इसका प्रारंभ का इतिहास और जगह के कोई अधिकारिक वर्णन तो नहीं लेकिन ऐतिहासिक सूत्रों से सिद्ध होता है कि इसका प्रयोग पूर्व देशों में बहुत प्राचीन काल में होता था। संभवत: भारत से ही यह विद्या ईरान होते हुए यूनान और अरब देशों में पहुँची थी।

प्रमुख तथ्य

1.सन 1900 के पेरिस ओलोम्पिक में पहली बार तीरंदाजी का खेल शामिल किया गया था लेकिन 1912 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में इसे निकाल दिया गया था|

2.इसे पुनः 1920 में शामिल किया गया लेकिन इसके बाद सन 1972 के मध्य तक के ओलंपिक खेलों में इसे फिर शामिल नहीं किया गया|

3.तीरंदाजी प्रतियोगिता को विशेष रूप से 1972 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में म्यूनिख में शामिल किया गया। इस दौरान पुरुष एकल और महिला एकल प्रतियोगिता का भी आयोजन हुआ|

4.भारत में तीरंदाजी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 8 अगस्त 1973 को में ‘भारतीय तीरंदाजी संगठन’ का गठन किया गया। इंडियन आर्चरी असोसिएशन भारत में इस खेल के नियम और संरक्षण करती है|

5.इंडियन आर्चरी असोसिएशन (AAI) तीन कैटिगरी में टूर्नामेंट कराता है 1.इंडियन राउंड, 2.रिकर्व, 3.कंपाउंड

प्रमुख शब्दावली

बैग, बुल्स आइ, मार्क्समैनशिप, मजल, प्लग

प्रमुख खिलाड़ी

डोला बनर्जी, जयंत ठाकुर, लिम्बा राम, सत्यदेव प्रसाद और तरुनदीप राय, दीपिका कुमारी और लैश्रम बोम्बयला देवी|

प्रमुख प्रतियोगिता

ओलोम्पिक,एशियन खेल,कॉमनवेल्थ खेल और राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं|

 

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