भारत रत्न

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पुरुस्कार का इतिहास

देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न की स्थापना 1954 में हुई थी. यह मानव प्रयास के किसी भी क्षेत्र में असाधारण सेवा, सर्वोच्च क्रम के प्रदर्शन की मान्यता के लिए दिया जाता है. जाति, व्यवसाय, स्थिति या लिंग के भेदभाव के बिना कोई भी व्यक्ति इस पुरस्कार के लिए पात्र है.

मूलतः इस पुरूस्कार को कला, साहित्य, विज्ञान और सार्वजनिक सेवाओं के लिए दिया जाता था, लेकिन दिसम्बर 2011 में सरकार ने इसे विस्तार देते हुए इसमें “मानव प्रयास के किसी भी क्षेत्र” जोड़ा.

भारत रत्न के लिए प्रधानमंत्री द्वारा न्यूनतम तीन नामांकनों के साथ प्रतिवर्ष सिफारिश की जाती है. पुरुस्कार दिए जाने पर, प्राप्तकर्ता को राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित एक सनद (प्रमाणपत्र) और एक प्राचीन पदक दिया जाता है.

पुरस्कार को संक्षेप में अपने इतिहास में दो बार निलंबित कर दिया गया था. पहला निलंबन 1977 में मोरारजी देसाई के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद हुआ था (पुरस्कार के निलंबन का कारण बताया गया था कि ये पुरस्कार संविधान के अनुच्छेद 18 में दिए गए मौलिक अधिकार उपाधियों के अंत का उल्लंघन करता है). उनकी सरकार ने 13 जुलाई 1977 को सभी नागरिक पुरस्कार वापस ले लिए थे.

इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 25 जनवरी 1980 को यह निलंबन रोक दिया गया. ये नागरिक पुरस्कार पुनः 1992 के मध्य में निलंबित किये गए, जब इन पुरस्कारों की “संवैधानिक वैधता” को चुनौती देते हुए एक केरल उच्च न्यायालय में और एक मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में दो जनहित मुकदमे दायर किये गए थे.

मुकदमेबाजी के समापन के बाद दिसम्बर 1995 में सर्वोच्च नयायालय ने पुनः पुरस्कारों को बहाल किया.

पुरस्कार का विवरण

1954 के मूल विनिर्देशों के अनुसार पुरस्कार सोने से बना 35 मिमी व्यास वाला एक वृत्ताकार पदक होता था जिसके बीच में अग्रभाग की तरफ एक प्रकाशित सूर्य बना होता था. देवनागरी लिपि में ‘भारत रत्न’ शब्द इसके निचले तरफ चांदी से खुदा होता था और ऊपरी तरफ एक माला होती थी. विपरीत तरफ मध्य में प्लैटिनम धातु से राष्ट्रीय प्रतीक बना होता था और निचले तरफ देवनागरी लिपि में आदर्श वाक्य “सत्यमेव जयते” (लिखा होता था.

एक वर्ष बाद (1955 में), इस डिजाईन में बदलाव किया गया. आज का पदक पीपल के पत्ते के आकार का है, जो लगभग 59 मिमी लम्बा, 48 मिमी चौड़ा और 3.2 मिमी मोटा है और प्लैटिनम धातु का घेरा है. उभरा हुआ प्रकाशित सूर्य का डिजाइन प्लैटिनम से बना है. 1954 की तरह ही अग्रभाग में “भारत रत्न” एवं पश्चभाग में “सत्यमेव जयते” खुदा हुआ है. 1957 में, चाँदी से सजावट को कांसे से बदल दिया गया.

भारत रत्न का पदक अन्य नागरिक पदकों जैसे पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री और परम वीर चक्र के साथ कोलकाता के अलीपुर टकसाल, में बनाये जाते हैं.

मुख्य बिंदु

भारत रत्न पुरस्कार में कोई मौद्रिक अनुदान नहीं होता. इस पुरस्कार को प्राप्तकर्ता के नाम के उपसर्ग या प्रत्यय के रूप में नहीं प्रयोग किया जा सकता.

पहली बार 1954 में यह पुरस्कार चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (भारतीय राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी, अधिवक्ता, और लेखक), सर्वपल्ली राधाकृष्णन (भारतीय दार्शनिक और राजनेता) और सर चंद्रशेखर वेंकटरमण (भौतिक विज्ञानी) को दिया गया था.

अंतिम बार (2015 में) यह पुरस्कार शिक्षाविद पंडित मदन मोहन मालवीय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दिया गया था जो ये पुरस्कार प्राप्त करने वाले 44वें और 45वें शख्शियत थे.

1992 में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को भारत रत्न से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया था। लेकिन उनकी मृत्यु विवादित होने के कारण पुरस्कार के मरणोपरान्त स्वरूप को लेकर प्रश्न उठाया गया था। इसीलिए भारत सरकार ने यह सम्मान वापस ले लिया। उक्त सम्मान वापस लिये जाने का यह एकमेव उदाहरण है.

खेल जगत से अब तक किसी को यह सम्मान हासिल नहीं हो पाया था, लेकिन सचिन तेंडुलकर पहले ऐसे खिलाडी़ होंगे जिन्हें यह सम्मान 2014 में दिया गया.

ये कही नही लिखा कि भारत रत्न सिर्फ भारतीय नागरिक को ही दिया जाएगा. अब तक 2 विदेशियों को यह अवार्ड मिल चुका है. पहला अब्दुल गफ्फार खान को 1987 में और दूसरा अफ्रीका के जन नेता नेल्सन मंडेला को 1990 में दिया गया.