विश्व बैंक द्वारा हाल ही में जारी वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट, 2018 (World Development Report, 2018) में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की राह में मौज़ूद चुनौतियों को संबोधित किया गया है।

4 दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब विश्व बैंक ने अपनी वार्षिक डेवलपमेंट रिपोर्ट में शिक्षा का ज़िक्र किया है।

वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट, 2018

रिपोर्ट का उद्देश्य:

विश्व बैंक की ‘वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2018: लर्निंग टू रियलाइज एजुकेशन प्रॉमिस’ (“LEARNING to Realize Education’s Promise”) शिक्षा पर केंद्रित है। यह रिपोर्ट मुख्य रूप से चार विषयों पर गंभीरता से विचार करती है:

1.शिक्षा का वादा।

2.‘सीखने की प्रक्रिया’ पर अधिक ज़ोर।

3.कैसे स्कूलों में ‘सीखने की प्रक्रिया’ को बढ़ावा मिले?

4.कैसे व्यवस्था को ‘सीखने की प्रक्रिया’ के अनुकूल बनाया जाए?

मुख्य तथ्य

1.इस रिपोर्ट की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें केवल सामान्य रूप से शिक्षा पर चर्चा नहीं की गई है बल्कि कुपोषण और गरीबी से शिक्षा के अंतर्संबंध एवं इसके निजीकरण पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।

2.रिपोर्ट में कहा गया है कि लाखों युवाओं को जीवन में बेहतर करने का मौका इसलिये नहीं मिल पाता है क्योंकि उनके प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल उन्हें जीवन में सफल होने के लिये आवश्यक शिक्षा देने में नाकाम रहते हैं।

3.रिपोर्ट में बताया गया है कि कम-आय वाले देशों में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग की दर समृद्ध देशों की तुलना में तीन प्रतिशत अधिक है।

4.बचपन के स्टंटिंग के यानी अल्प-वृद्धि का प्रभाव वयस्कता में भी बना रहता है।

5.इस रिपोर्ट के कई अन्य महत्त्वपूर्ण सुझावों में से सबसे अहम् सुझाव यह है कि भारत में प्राइवेट स्कूलों का भी प्रदर्शन सार्वजनिक विद्यालयों जैसा ही है।

6.यानी इस रिपोर्ट के बिंदु इस प्रचलित अवधारणा की विरोधाभासी तस्वीर पेश करते हैं कि प्राइवेट स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाती है।

7.ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन चौथाई और पाँचवीं कक्षा के आधे से ज़्यादा छात्र दो अंकों का जोड़-घटाने वाला मामूली सवाल हल करने में सक्षम नहीं हैं।

8.निम्न और मध्यम आय वाले 12 वैसे देशों की सूची में मालावी के बाद भारत दूसरे स्थान पर है जहाँ वैसे बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है, जो कक्षा 2 में हैं और किसी संक्षिप्त पाठ का एक भी शब्द नहीं पढ़ सकते हैं।

9.रिपोर्ट में कहा गया है कि बिना सीखने की प्रक्रिया को बढ़ावा दिये, शिक्षा के ज़रिये गरीबी को खत्म करने और सबको समृद्ध बनाने के विचार को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता।

क्या देश की शिक्षागत समस्याएं?

हमारी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन शिक्षा के मोर्चे पर हमें एक लंबा सफर तय करना है। हालाँकि, हमारा देश निरक्षरता की समस्या से निपटने के लिये कई प्रयास कर रहा है। भारत में शिक्षा की दयनीय स्थिति के द्योतक कुछ तथ्य हैं:

1.वैश्विक शिक्षा रिपोर्ट-2004 (global education report-2004)  के अनुसार शिक्षा क्षेत्र में बेहतरी के मामले में भारत 127 देशों की सूची में 106वें स्थान पर था।

2.भारत में सबसे ज़्यादा निरक्षर जनसंख्या है, दुनिया भर में निरक्षर लोगों की कुल संख्या में भारत का योगदान लगभग 34% है।

3.भारत दुनिया की दस सबसे तेज़ी से वृद्धि कर रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन दुनिया के एक तिहाई निरक्षर लोग अकेले यहीं रहते हैं।

4.आज़ादी के 70 सालों बाद भी हम शिक्षा व्यवस्था को विश्व-स्तरीय नहीं बना पाए हैं, खासकर गरीबों के लिये तो बेहतर शिक्षा आज भी एक लक्ज़री है।


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